एक बची रह गई स्त्री
मेरे भीतर एक बची रह गई स्त्री है
लग सकता है अजीब ,पर है ये सच
अम्मा कहतीं हैं
जब गर्भ में था तो सपने आते थे
लौकी के ,अंगूठी के ,बिछिया के ,पायल के
सारे एक स्त्री-शिशु के आगमन के पूर्व-संकेत
हर लक्षण, हर संकेत , हर खटका
मानो आहट था
एक लड़की के अवांछित आगमन का
पर मेरी दृष्टि है अब भी धूमिल
हूँ अब भी संशयग्रस्त
बल्कि एक विश्वास की सीमा तक
घेरे है यह संदेह
कि मेरे भीतर अब भी एक बची रह गई स्त्री है
वही स्त्री जिसने बचपन के खेलों में
रोका था उस थोड़ी सी बेईमानी से
जिससे जीत आसान हो सकती थी
और बख्शी थी एक संतुष्टि भरी मुस्कान
इमानदारी से मिली हार में भी
उसी स्त्री की उपस्थिति ने
बिना किसी 'मरदाना' संकोच के
रोने दिया था जार जार ,जी भर कर
किसी विश्वस्त कंधे पर सर रख
और बहने दिये थे ,मन के भाव
अविकल ,आँसुओं की धार में
उम्र के इस पड़ाव पर
इस स्त्री को कुछ ठीक ठीक चीन्हने लगा हूँ
वह आ जाती है अब भी बीच में
और सहसा रोक देती है दूसरों को लंगड़ी लगा गिराने को
और उन्हें अपनी कामयाबी की सीढियां बनाने से
वही स्त्री अपनी उमंगों हर्षों के बीच भी
थोड़ी सी जगह बचा रखती है
पराए दुखों के अनुभूति की भी
थोड़ी गुंजाईश दूसरों की हँसी में
उदार खिलखिलाहट की भी
यही स्त्री जब तब बनती रही है अवरोध
भीतर के 'नर-पिशाच' के कुलाचों में
खींचती रही है बाहर
हिंसा व व्यभिचार के 'पुरुषोचित' क्रीडांगन से
लोक-वर्जित श्रुति-शापित उसी असूर्यपश्या देवि ने ,
जिसके आसन्न आगमन की संभावना मात्र से
सहमे थे मेरे कुनबे के लोग
सन चौहत्तर के उस सितम्बर में
अपने आगमन को कर स्थगित
बहने दिया नीरन्ध्र अपने सत्व को
इस पुरुष शरीर में
और बख्शी मुझे
चुटकी भर अधिक आदमियत
आभारी हूँ उस देवी का
जिसने सवयम को रख नेपथ्य में तमाव्रित्त
मेरे भीतर ही रहकर किया मुझे दीप्त
मनुष्यत्व की आभा में ....
मेरे भीतर एक बची रह गई स्त्री है
लग सकता है अजीब ,पर है ये सच
अम्मा कहतीं हैं
जब गर्भ में था तो सपने आते थे
लौकी के ,अंगूठी के ,बिछिया के ,पायल के
सारे एक स्त्री-शिशु के आगमन के पूर्व-संकेत
हर लक्षण, हर संकेत , हर खटका
मानो आहट था
एक लड़की के अवांछित आगमन का
इतना निश्चय हो चला था अम्मा को
इस पूर्वाभास का ,कि उन्होंने सिलवा रखे थे
पहले से ही फ्रोक ,और लड़कियों के दीगर कपड़े
पिता को भी कर रखा था सचेत
जरूरी पैसे जमा करने को
शादी-ब्याह में होने वाले खर्च के मुताल्लिक
और रखने को पीठ सीधी ,छाती कड़ी
उठाने हेतु ,एक असमय आने वाले बोझ को
सब तैयार थे , प्रतीक्षारत थे
उद्विग्न भी ,आशंकित भी
और जब इन सारे पूर्वाभासों
समस्त लक्षणों , संकेतों को
लगभग चकमा देता हुआ ,
हुआ मेरा जन्म ,एक नर शिशु का
तो यह उन सब आशंकितों के लिए
एक राहत भरे अचरज सा था
सब ने मानो राहत सांस ली
और डाली निगाह , शंका भरी ,
अपने विश्वासों ,मान्यताओं पर
और खंगाला अपनी आदिम दृष्टि को
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इस पूर्वाभास का ,कि उन्होंने सिलवा रखे थे
पहले से ही फ्रोक ,और लड़कियों के दीगर कपड़े
पिता को भी कर रखा था सचेत
जरूरी पैसे जमा करने को
शादी-ब्याह में होने वाले खर्च के मुताल्लिक
और रखने को पीठ सीधी ,छाती कड़ी
उठाने हेतु ,एक असमय आने वाले बोझ को
सब तैयार थे , प्रतीक्षारत थे
उद्विग्न भी ,आशंकित भी
और जब इन सारे पूर्वाभासों
समस्त लक्षणों , संकेतों को
लगभग चकमा देता हुआ ,
हुआ मेरा जन्म ,एक नर शिशु का
तो यह उन सब आशंकितों के लिए
एक राहत भरे अचरज सा था
सब ने मानो राहत सांस ली
और डाली निगाह , शंका भरी ,
अपने विश्वासों ,मान्यताओं पर
और खंगाला अपनी आदिम दृष्टि को
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पर मेरी दृष्टि है अब भी धूमिल
हूँ अब भी संशयग्रस्त
बल्कि एक विश्वास की सीमा तक
घेरे है यह संदेह
कि मेरे भीतर अब भी एक बची रह गई स्त्री है
वही स्त्री जिसने बचपन के खेलों में
रोका था उस थोड़ी सी बेईमानी से
जिससे जीत आसान हो सकती थी
और बख्शी थी एक संतुष्टि भरी मुस्कान
इमानदारी से मिली हार में भी
उसी स्त्री की उपस्थिति ने
बिना किसी 'मरदाना' संकोच के
रोने दिया था जार जार ,जी भर कर
किसी विश्वस्त कंधे पर सर रख
और बहने दिये थे ,मन के भाव
अविकल ,आँसुओं की धार में
उम्र के इस पड़ाव पर
इस स्त्री को कुछ ठीक ठीक चीन्हने लगा हूँ
वह आ जाती है अब भी बीच में
और सहसा रोक देती है दूसरों को लंगड़ी लगा गिराने को
और उन्हें अपनी कामयाबी की सीढियां बनाने से
वही स्त्री अपनी उमंगों हर्षों के बीच भी
थोड़ी सी जगह बचा रखती है
पराए दुखों के अनुभूति की भी
थोड़ी गुंजाईश दूसरों की हँसी में
उदार खिलखिलाहट की भी
यही स्त्री जब तब बनती रही है अवरोध
भीतर के 'नर-पिशाच' के कुलाचों में
खींचती रही है बाहर
हिंसा व व्यभिचार के 'पुरुषोचित' क्रीडांगन से
लोक-वर्जित श्रुति-शापित उसी असूर्यपश्या देवि ने ,
जिसके आसन्न आगमन की संभावना मात्र से
सहमे थे मेरे कुनबे के लोग
सन चौहत्तर के उस सितम्बर में
अपने आगमन को कर स्थगित
बहने दिया नीरन्ध्र अपने सत्व को
इस पुरुष शरीर में
और बख्शी मुझे
चुटकी भर अधिक आदमियत
आभारी हूँ उस देवी का
जिसने सवयम को रख नेपथ्य में तमाव्रित्त
मेरे भीतर ही रहकर किया मुझे दीप्त
मनुष्यत्व की आभा में ....